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| يادداشت ها: | |
| سرشناسه: |
خلوتي، محمد ابراهيم بن احمد |
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| معرفی اثر: |
اثر پند و اندرزهايي در زمينه اخلاق است. در بخشي نيز به ستايش از ناصر الدين شاه و مظفر الدين شاه قاجار پرداخته شده. |
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| اهدا کننده: | |
| کاغذ، جلد: |
كاغذ : فرنگي شكري. جلد : مقوايي، روكش تيماج سبز، مجدول، ترنج و سر ترنج با حواشي و نقوش اسليمي. آستر بدرقه : كاغذ ابره (زمينه بنفش)، 16 × 5/21 س. م. |
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| شرح پدیدآور: |
محمد ابراهيم خان متخلص به خلوتي |
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| وضعیت کتابت: |
خط : نستعليق. كاتب : سلطان الكتاب محلاتي. تاريخ كتابت : 1322ق. |
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| موضوع: | |
| مشخصات ظاهری: |
339 ص. 15 س. 10/5 × 17 س. م. ◄ سرلوح، كمند، جدول مزدوج. |
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| منابع: |
مشار فارسي (1 : 53)، الذريعه (1 : 31)، دانشگاه (16 : 569). |
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| تاریخ تولد و وفات: | |
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| شماره مدرک : | |
| مشخصات نشر: |
طهران : مطبعه آقا ميرزا علي اصغر و آقا ميرزا عبد الرحيم، 1322ق. |
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| آغاز، انجام، انجامه: |
آغاز : بسمله، السلام علي من اتبع الهدي، سلام و درود من بر جوانان نو خواسته و نو باوگان آراسته روشن ضمير نصيحت پذير پاك ... ◄ انجام : ... به چه دليل و امتياز استوار داري و خود را اشرف مخلوقات شماري و حال آنكه احوج و اظلم آناني چه تو به همه آن ها محتاجي و آنان را به تو احتياجي نيس ... ◄ انجامه : ... به كامش همه روزه گردد سپهر* ز شادي فروزان رخش همچو مهر. |
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| مهرها: |
ص. 2 : مهر بيضوي، سجع : ... علي. |
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